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Friday, April 18, 2008

सूर आयो सिर पर छाया आई पायनतर...

राग : सारंग

सूर आयो सिर पर छाया आई पायनतर,

पंथी सब झुक रहे देख छाँह गहरी।।

धंधी जन छांड रहेरी धूपन के लिए,
पशु पंछी जीव जंतु चिरिया चुप रहरी ॥

व्रजके सुकुमार लोग दे दे कमार सोवे,

उपवन की व्यार्तामें पोढे पिय प्यारी ॥

सूर अलबेली चल काहेको डरत है ,

महाकी मध्य रात जैसे जेठ की दुपहरी॥

Sunday, February 24, 2008

नेह लग्यो मेरो श्याम सुंदरसो...

राग : काफ़ी

नेह लग्यो मेरो श्याम सुंदरसो । नेह लग्यो मेरो श्याम सुंदरसो ॥

आयो वसंत सभी बन फुले । खेतन फूली है सरसों ।

मैं पीरी पियाके विरहसो । निकसत ताण अधरसो ॥ कहो जाय बंसीवरसो ॥

फागुन में सब होरी खेलत है, अपने अपने वरसो ।

पिय के वियोग जोगन व्हे निकरी , धूर उड़ावत करसो । चली मथुराकी डगरसो ॥

ऊधो जाय द्वारका कहियो, इतनी अरज मेरी हरीसों ।

विरहव्यथासे जियरा डरत है , जबते गए हरी घरसो । दरस देखनको हों तरसो ॥

सूरदास मेरी इतनी अरज है, कृपासिंधु गिरिधरसों ।

गसेरी नदियाँ, नाव पुरानी, अबके आय उबारो सागारसो । अरज मेरी राधावरसों ॥

Friday, January 11, 2008

तुमसो बोलवेकी नाही....

राग : ललित

बोलवेकी नाहीं, तुमसो बोलवेकी नाहीं।
घर घर गमन करत सुंदरपिय,
चित्त नाही एक ठाहीं॥१॥

कहा कहो शामल घन तुमसो,
समज देख मन माहीं।
सूरदास प्रभु प्यारीके वचन सुन,
ह्रदय मांझ मुस्कानी॥२॥

कब देखो मेरी और....

राग : ललित

कब देखो मेरी और, नागर नन्दकिशोर,
बीनती करत भयो भोर।
हम चितवत तुम चितवत नाही,
मेरे कर्म कठोर॥१॥

जनम जनम की दासी तिहारी, तापर इतनो जोर।
सूरदासप्रभु तुम्हारे रोम पर,
वारो कंचन खोर॥२॥

Saturday, September 15, 2007

मैयारी तू मोहि बडो कर लैरी....

राग : सारंग

मैयारी तू मोहि बडो कर लैरी।
दूध दही धृत माखन मेवा,
जो मांगो सो दैरी॥१॥

कछु दुराव राखै जिन मोसो,
जोई मोई रुचेरी।
रंगभूमि में कंस पछारौ,
कहे कथा सुखसौरी॥२॥

सूरदास स्वामीकी लीला,
मथुरा वास करोरी।
सुंदरश्याम हसत जननीसो,
नन्दलालकी सौरी॥३॥

Sunday, August 26, 2007

पवित्रा पहरे को दिन आयो.....

राग : सारंग

पवित्रा पहरे को दिन आयो।
केसर कुमकुम रसरंग,
वागो कुंदन हार बनायो॥१॥

जय जयकार होत वसुधा पर,
सुर मुनि मंगल गायो।
पतित पवित्र किये सुख सागर,
सूरदास यश गायो॥२॥

Friday, August 17, 2007

नई बात सुन आई....

राग : मल्हार

हों तो एक नई बात सुन आई।
महरि जसोदा ढोटा जायो,
आंगन बजत बधाई ॥१॥

कहिये कहा कहत नहि आवे,
रतन भूमि छबि छाई ।
नाचत बिरध तरुण अरु बालक,
गोरस कीच मचाई ॥२॥

द्वारें भीतर गोप ग्वालन की,
वरनों कहा बढाई ।
सूरदास प्रभु अंतरयामी,
नंदसुवन सुखदाई ॥३॥

Friday, July 27, 2007

ये बड़भागी मोर...


राग : मल्हार
ये बड़भागी मोर,
देखो माई, ये बड़भागी मोर।
जीनकी पंखको मुकुट बनत है,
सीर धरे नंदकिशोर ॥१॥

ये बड़भागी नन्द जशोदा,
पुण्य किये भरी जोर ।
वृन्दावन हम क्यों ना भये,
लागत पग की कोर ॥२॥

ब्रह्मादिक सनकादिक नारद,
ठाडे है कर जोर ।
सूरदास संतनको सरवस,
देखियत माखनचोर ॥३॥

गोवर्धन पर मुरवा...

राग : मल्हार

गोवर्धन पर मुरवा,
बोले माई, गोवर्धन पर मुरवा,
तेसिये श्यामघन मुरिली बजाई,
तेसेही उठे झुक धुरवा ।१।

बड़ी बड़ी बूंदन बर्खन लाग्यो,
पवन चलत अति जुरवा,
सूरदासप्रभु तिहारे मिलन को,
निस जागत भयो भुरवा ॥२॥

Tuesday, May 29, 2007

२१) नाम महिमा ऐसी जु जानो...

राग : टोडी

नाम महिमा ऐसी जु जानो ।
मर्यादादिक कहें लौकिक सुख लहे
पुष्टि कों पुष्टिपथ निश्चे मानो ॥१॥

स्वाति जलबुन्द जब परत हें जाहि में ,
ताहि में होत तेसो जु बानो ।
श्री यमुने कृपा सिंधु जानि स्वाति जल बहु मानि,
सूर गुण पुर कहां लो बखानों ॥२॥

२२) भक्त को सुगम श्री यमुने अगम ओरें....

राग : टोडी

भक्त को सुगम श्री यमुने अगम ओरें ।
प्रात ही न्हात अघजात ताकें सकल
जमहुं रहत ताहि हाथ जोरे ॥१॥

अनुभवि बिना अनुभव कहा जानही
जाको पिया नही चित्त चोरें ।
प्रेम के सिंधु को मरम जान्यो नही,
सूर कहे कहा भयो देह बोरे ॥२॥

२३) फल फलित होय फलरूप जाने...

राग : टोडी

फल फलित होय फलरूप जाने ।
देखिहु ना सुनी ताहि की आपुनी,
काहु की बात कहो कैसे जु माने ॥१॥

ताहि के हाथ निर्मोल नग दीजिये,
जोई नीके करि परखि जाने ।
सूर कहें क्रूर तें दूर बसिये सदा,
श्री यमुना जी को नाम लीजे जु छाने ॥२॥

२४) श्री यमुने पति दास के चिन्ह न्यारे...

राग : टोडी

श्री यमुने पति दास के चिन्ह न्यारे ।
भगवदी को भगवत संग मिलि रहत हैं,
जाके हिय बसत प्राण प्यारे ॥१॥

गूढ यमुने बात सोई अब जानही,
जाके मनमोहन नैनतारे ।
सूर सुख सार निरधार वे पावहीं,
जापर होय श्री वल्लभ कृपा रे ॥२॥

Friday, May 11, 2007

एक पलक जो रहिये वृंदावन.....

राग : बिहाग

एक पलक जो रहिये वृंदावन।
जन्म जन्म के पाप कटत हे कृष्ण कृष्ण मुख कहिये ॥१॥

महाप्रसाद और जल यमुना कि तनक तनक भर लइये।
सूरदास वैकुंठ मधुपुरी भाग्य बिना कहां पइये ॥२॥

दृढ इन चरण कैरो भरोसो...

राग : बिहाग

दृढ इन चरण कैरो भरोसो, दृढ इन चरणन कैरो
श्री वल्लभ नख चंद्र छ्टा बिन, सब जग माही अंधेरो । भरोसो…

साधन और नही या कलि में, जासों होत निवेरो । भरोसो….
सूर कहा कहे, विविध आंधरो, बिना मोल को चेरो । भरोसो……