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Sunday, April 6, 2008

फूल भवन में गिरिधर बैठे फूलन को शोभीत सिंगार....

राग : कान्हरो

फूल भवन में गिरिधर बैठे फूलन को शोभीत सिंगार।

फूलन को कटी बन्यो पिछोरा फूलन बांधे पेंच संवार ॥

फूलनकी बेनी जू बनी सीर फूलन के जू बने सब हार ।

फूलन के मुक्त छबी छाजत फूलन लटकन सरस संवार ॥

करन फूल फूलन कर पॉहोची गेंद फूल जल करत विहार ।

राधा माधो हसत परस्पर दास निरखत डारत तन वार ॥

Friday, May 11, 2007

फूलन की मंडली मनोहर बैठे.....

राग : सारंग

फूलन की मंडली मनोहर बैठे, जहाँ रसिक पिय प्यारी ।
फूलन के बागे और भूषण, फूलन की पाग संवारी ॥१॥

ढिंग फूली वृषभान नंदिनी, तैसिये फूल रही उजियारी ।
फूलन के झूमका झरोखा बहु, फूलन की रची अटारी ॥२॥

फूले सखा चकोर निहारत, बीच चंद मिल किरण संवारी ।
चतुर्भुज दास मुदित सहचारी, फूले लाल गोवर्धन धारी ॥३॥

फूलन की मंडली मनोहर बैठे


राग : सारंग


फूलन की मंडली मनोहर बैठे, मदन मोहन पिय राजत ।
प्रसरित कुसुम सुवासित चहुँदिश, लुब्ध मधुप गुंजारत गाजत ॥१॥

पहरे विविध भांत आभूषण, पीतांबर वैजयंती छाजत ।
देखि मुखारविंद की शोभा, रतिपति आतुर भयो अति भ्राजत ॥२॥

एकरूप बहुरूप परस्पर, वरणों कहा देख मन लाजत ।
रसिकचरण सरोज आसरो करिवे, कोटि यत्न जिय साजत ॥३॥

बात कहत रसरंग उच्छलीता



राग: सारंग

बात
कहत रसरंग उच्छलीता ।
फूलन के महल बिराजत दोउ , मन्द सुगंध निकट वहे सरिता ॥१॥
मुख मिलाय हस देखत दर्पणमें , सुंदर श्रमित उरमाल विगलिता ।
परमानन्द प्रभु प्रेम विवश भये , कही हममें सुंदर को है ललिता ॥२॥
बात कहत रसरंग उच्छलीता ।