राग : सुहो
कमल मुख देखत, तृप्त ना होय ।
यह सुख कहा दुहागीन जाने, रही निसाभर सोय ॥ १॥
ज्यों चकोर चाहत उडुराजे, चंद वदन रही जोय ।
नेक अकोर देत नही राधा, चाहत पीयरी निचोय ॥ २॥
उन् तो अपनों सर्वस्व दीनो, एक प्राण वपु दोय ।
भजन भेद न्यारो परमानन्द, जानत विरला कोय ॥ ३॥
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Wednesday, July 11, 2007
Friday, May 11, 2007
नंद भवन को भूषण माई....
राग : बिलावल
नंद भवन को भूषण माई ।
यशुदा को लाल, वीर हलधर को, राधारमण सदा सुखदाई ॥
इंद्र को इंद्र, देव देवन को, ब्रह्म को ब्रह्म, महा बलदाई ।
काल को काल, ईश ईशन को, वरुण को वरुण, महा बलजाई ॥
शिव को धन, संतन को सरबस, महिमा वेद पुराणन गाई ।
‘नंददास’ को जीवन गिरिधर, गोकुल वंदन कुंवर कन्हाई ॥
नंद भवन को भूषण माई ।
यशुदा को लाल, वीर हलधर को, राधारमण सदा सुखदाई ॥
इंद्र को इंद्र, देव देवन को, ब्रह्म को ब्रह्म, महा बलदाई ।
काल को काल, ईश ईशन को, वरुण को वरुण, महा बलजाई ॥
शिव को धन, संतन को सरबस, महिमा वेद पुराणन गाई ।
‘नंददास’ को जीवन गिरिधर, गोकुल वंदन कुंवर कन्हाई ॥
आओ गोपाल श्रृंगार बनाऊ...
राग : बिलावल
आओ गोपाल श्रृंगार बनाऊ ।
विविध सुगंधन करो उबट्नो, पाछे उष्णजल ले जू न्हवावू ॥१॥
अंग अंगोछ गुहूं तेरी बेनी, फूलन रची रची भाल बनाऊ ।
सुरंग पाग जरतारी तोरा , रत्नखचित शिरपेच बंधाऊ ॥ २॥
वागो लाल सुनेरी छापो, हरी इजार चरनन विरचाऊ ।
पटुका सरस वैंजनी रंग को , हसली हार हमेल बनाऊ ॥ ३॥
आओ गोपाल श्रृंगार बनाऊ ।
विविध सुगंधन करो उबट्नो, पाछे उष्णजल ले जू न्हवावू ॥१॥
अंग अंगोछ गुहूं तेरी बेनी, फूलन रची रची भाल बनाऊ ।
सुरंग पाग जरतारी तोरा , रत्नखचित शिरपेच बंधाऊ ॥ २॥
वागो लाल सुनेरी छापो, हरी इजार चरनन विरचाऊ ।
पटुका सरस वैंजनी रंग को , हसली हार हमेल बनाऊ ॥ ३॥
गजमोतींन के हार मनोहर, वनमाला ले उर पहेराऊ ।
ले दर्पण देखो मेरे प्यारे , निरख निरख उर नयन सिराऊ ॥४॥
मधु मेवा पकवान मिठाई, अपने कर ले तुम्हे जिमाऊ ।
विष्णुदास को यह कृपाफल, बाललीला हो निसदीन गाऊँ ॥५॥
भोग श्रृंगार यशोदा मैया....
राग : बिलावल
भोग श्रृंगार यशोदा मैया,श्री विट्ठलनाथ के हाथ को भावें
न्हवाय श्रृंगार करत हैं, आछी रुचि सों मोही पाग बंधावें ॥
तातें सदा हों उहां ही रहत हो, तू दधि माखन दूध छिपावें ।
छीतस्वामी गिरिधरन श्री विट्ठल, निरख नयन त्रय ताप नसावें ॥
भोग श्रृंगार यशोदा मैया,श्री विट्ठलनाथ के हाथ को भावें
न्हवाय श्रृंगार करत हैं, आछी रुचि सों मोही पाग बंधावें ॥
तातें सदा हों उहां ही रहत हो, तू दधि माखन दूध छिपावें ।
छीतस्वामी गिरिधरन श्री विट्ठल, निरख नयन त्रय ताप नसावें ॥
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