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Tuesday, May 15, 2007

३३) श्री यमुने तुमसी एक हो जु तुमहीं....

राग : केदार

श्री यमुने तुमसी एक हो जु तुमहीं ।
करि कृपा दरस, निसवासर दीजिये,
तिहारे गुनगान को रहत उद्यम ही ॥१॥

तिहारे पाये ते, सकल निधि पावहीं,
चरण्कमल चित्त, भ्रमर भ्रमहीं ।
कृष्णदासनि कहें, कौन यह तप कियो,
तिहारे ढींग रहत है लता द्रुम ही ॥२॥

३४) ऐसी कृपा कीजिये लिजिये नाम...

राग : केदार

ऐसी कृपा कीजिये लिजिये नाम ।
श्री यमुने जग वंदिनी, गुण न जात काहु गिनी,
जिनके ऐसे धनी सुंदर श्याम ॥१॥

देत संयोग रस, ऐसे पियु है जु बस,
सुनत तिहारो सुजस पूरे सब काम ।
कृष्णदासनि कहे, भक्त हित कारने,
श्री यमुने एक छिन नहिं करे विश्राम ॥२॥

३५) श्री यमुनाजी के नाम अघ दूर भाजे...

राग : केदार

श्री यमुनाजी के नाम अघ दूर भाजे ।
जिनके गुन सुनन को, लाल गिरिधरन पिय,
आय सन्मुख ताके विराजे ॥१॥

तिहिं छिनु काज ताके सगरे सरें
जायके मिलवत ब्रजवधू समाजे ।
कृष्णदासनि कहे ताहि अब कौन डर,
जाके ऊपर श्री यमुने सी गाजे ॥२॥

३६) श्री यमुनाजी को नाम तेईजू लेहे...

राग : केदार

श्री यमुनाजी को नाम तेईजू लेहे ।
जाकी लगन, लगी नंदलाल सों,
सर्वस्व देके निकट रहे हैं ॥१॥

जिनही सुगम जानि, बात मन में जु मानि,
बिना पहिचान कैसे जु पैये ।
कृष्णदासनि कहे श्री यमुने नाम नौका ,
भक्त भवसिंधुतें योंहि तरिये ॥२॥