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Saturday, January 12, 2008

जागत रैंन गई, पिया बिन.....

राग : ललित

जागत रैंन गई, पिया बिन
जागत रैंन गई।
अवधि वदी गए, अजहू न आये,
बड़ी बेर भयीं॥१॥

कछु कहत हो, करत कछु और,
कौन सीख दई।
सांच नही तेरो एको अंग,
कहाँजू रीत लई॥२॥

कैसे कीजे विश्वास, भये हो विषई।
रसिक प्रीतम रावरी, छीन छीन गती नई॥३॥

Friday, January 11, 2008

तुमसो बोलवेकी नाही....

राग : ललित

बोलवेकी नाहीं, तुमसो बोलवेकी नाहीं।
घर घर गमन करत सुंदरपिय,
चित्त नाही एक ठाहीं॥१॥

कहा कहो शामल घन तुमसो,
समज देख मन माहीं।
सूरदास प्रभु प्यारीके वचन सुन,
ह्रदय मांझ मुस्कानी॥२॥

कब देखो मेरी और....

राग : ललित

कब देखो मेरी और, नागर नन्दकिशोर,
बीनती करत भयो भोर।
हम चितवत तुम चितवत नाही,
मेरे कर्म कठोर॥१॥

जनम जनम की दासी तिहारी, तापर इतनो जोर।
सूरदासप्रभु तुम्हारे रोम पर,
वारो कंचन खोर॥२॥

Tuesday, June 5, 2007

१३) चित्त में श्री यमुना, निशिदिन जु राखो...

राग: ललित

चित्त में श्री यमुना, निशिदिन जु राखो ।
भक्त के वश कृपा करत हें सर्वदा,
ऐसो श्री यमुना जी को हे जु साखो ॥१॥

जा मुख ते श्री यमुने यह नाम आवे,
संग कीजे अब जाय ताको ।
चतुर्भुजदास अब कहत हैं सबन सों,
तातें श्री यमुने यमुने जु भाखो ॥२॥

१४) प्राणपति विहरत श्री यमुना कूले..

राग: ललित

प्राणपति विहरत श्री यमुना कूले ।
लुब्ध मकरंद के भ्रमर ज्यों बस भये,
देखि रवि उदय मानो कमल फूले ॥१॥

करत गुंजार मुरली जु ले सांवरो,
सुनत ब्रजवधू तन सुधि जु भूले ।
चतुर्भुज दास श्री यमुने प्रेमसिंधु में,
लाल गिरिधरनवर हरखि झूले ॥२॥

१५) वारंवार श्रीयमुने गुणगान कीजे...

राग : ललित

वारंवार श्रीयमुने गुणगान कीजे ।
एहि रसनातें भजो नामरस अमृत,
भाग्य जाके हैं सोई जु पीजे ॥१॥

भानु तनया दया अति ही करुणामया,
इनहीं की कर आस अब सदाई जीजे ।
चतुर्भुजदास कहे सोई प्रभु पास रहे
जोइ श्री यमुनाजी के रस जु भीजे ॥२॥

१६) हेत करि देत श्री यमुने वास कुंजे...

राग: ललित

हेत करि देत श्री यमुने वास कुंजे ।
जहाँ निसवासर रास में रसिकवर,
कहां लों वरनिये प्रेमपुंजे ॥१॥

थकित सरिता नीर थकित ब्रजबधू भीर,
कोउ न धरत धीर मुरली सुनीजे ।
चतुर्भुजदास यमुने पंकज जानि,
मधुप की नामी चित्त लाय गुंजे ॥२॥