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Friday, April 18, 2008

सूर आयो सिर पर छाया आई पायनतर...

राग : सारंग

सूर आयो सिर पर छाया आई पायनतर,

पंथी सब झुक रहे देख छाँह गहरी।।

धंधी जन छांड रहेरी धूपन के लिए,
पशु पंछी जीव जंतु चिरिया चुप रहरी ॥

व्रजके सुकुमार लोग दे दे कमार सोवे,

उपवन की व्यार्तामें पोढे पिय प्यारी ॥

सूर अलबेली चल काहेको डरत है ,

महाकी मध्य रात जैसे जेठ की दुपहरी॥

Saturday, September 15, 2007

मैयारी तू मोहि बडो कर लैरी....

राग : सारंग

मैयारी तू मोहि बडो कर लैरी।
दूध दही धृत माखन मेवा,
जो मांगो सो दैरी॥१॥

कछु दुराव राखै जिन मोसो,
जोई मोई रुचेरी।
रंगभूमि में कंस पछारौ,
कहे कथा सुखसौरी॥२॥

सूरदास स्वामीकी लीला,
मथुरा वास करोरी।
सुंदरश्याम हसत जननीसो,
नन्दलालकी सौरी॥३॥

कहन लागे मोहन मैया मैया....

राग : नट

कहन लागे मोहन मैया मैया।
बावा बावा नंदरायसो,
अरु हलधरसो भैया भैया॥१॥

छगन मगन मधुसुदन माधो,
सब व्रज लेत बलैया।
नाचत मोर रहत संग उनके,
तोतरे बोल बुलैया॥२॥

दुरी खेलन जिन जाऊ मनोहर,
मारेगी कहुकी गैया।
मात यशोदा ठाड़ी टेरे,
ले ले नाम कन्हैया॥३॥

सब गोकुलमें आनंद उपज्यो,
घर घर होत बधैया।
नंदनंदंकी या छबि ऊपर,
परमानंद बलि जैया॥४॥

जब मेरो मोहन चलेगो घुटुरुवन.....

राग : सारंग


जब मेरो मोहन चलेगो घुटुरुवन,
तब हों करोंगी बधाई।
सर्वस्व वार देहोंगी,
तिही चीनू मैया कही तुतराई॥१॥

यशोदाको वचन सुनत केशोंप्रभु,
जननी प्रीति जानी अधिकाई।
नंद्सुवन सुख दियो मातको,
अति कृपाल मेरो नंद्लाई॥२॥

Sunday, August 26, 2007

राखी बांधत बहिन सुभद्रा.....

राग : सारंग

राखी बांधत बहिन सुभद्रा,
बल अरु श्री गोपाल के।
कंचन रत्न थार भरि मोती,
तिलक दियो नंदलाल के॥१॥

आरति करत रोहिणी जननी,
अंतर बढे अनुराग के।
आसकरण प्रभु मोहन नागर,
प्रेम पुंज ब्रज बाल के॥२॥

रक्षा बंधन को दिन आयो....

राग : सारंग

रक्षा बंधन को दिन आयो।
गर्गादि सब देव बुलाये,
लालहिं तिलक बनायो॥१॥

सब गुरुजन मिल देत असीस,
चिरंजीयो ब्रजरायो।
बाढो प्रताप नित या ढोटा को,
परमानंद जस गायो॥२॥

पवित्रा पहरे को दिन आयो.....

राग : सारंग

पवित्रा पहरे को दिन आयो।
केसर कुमकुम रसरंग,
वागो कुंदन हार बनायो॥१॥

जय जयकार होत वसुधा पर,
सुर मुनि मंगल गायो।
पतित पवित्र किये सुख सागर,
सूरदास यश गायो॥२॥

पवित्रा पहरे परमानंद....

राग : सारंग

पवित्रा पहरे परमानंद।
श्रावन सुदी एकादशी के दिन,
गिरिधर परमानंद॥१॥

श्री वृषभाननंदिनी निजकर,
ग्रथित विविध पटभांत।
ता मध्य सुभग सुवर्ण सुत्रसो,
पोई नवमती जात॥२॥

पवित्रा पहरे हिंडोरे जुलत,
दोउ आनंद कंद।
जमुना पुलिनमें कुंज मनोहर,
गावत परमानंद॥३॥

Saturday, August 18, 2007

ग्वाल देत है हेरी घर घर....

राग : सारंग

घर घर ग्वाल देत है हेरी।
बाजत ताल मृदुंग बाँसुरी,
ढोल दमामा भेरी ॥१॥

लूटत झपट्त खात मिठाई,
कही ना सकत कोऊ फेरी।
उन्मद ग्वाल करत कोलाहल,
व्रज वनिता सब घेरी॥२॥

ध्वजा पताका तोरनमाला,
सबे सिंगारी सेरी।
जय जय कृष्ण कहत परमानंद,
प्रगट्यो कंसको वेरी॥३॥

Thursday, May 24, 2007

२५) श्री यमुने रस खान को शीश नांऊ....

राग : सारंग

श्री यमुने रस खान को शीश नांऊ।
ऐसी महिमा जानि भक्त को सुख दान,
जोइ मांगो सोइ जु पाऊं ॥१॥

पतित पावन करन नामलीने तरन,
दृढ कर गहि चरन कहूं न जाऊं ।
कुम्भनदास लाल गिरिधरन मुख निरखत,
यहि चाहत नहिं पलक लाऊं ॥२॥

२६) श्री यमुने अगनित गुन गिने न जाई...

राग : सारंग

श्री यमुने अगनित गुन गिने न जाई ।
श्री यमुने तट रेणु ते होत है नवीन तनु,
इनके सुख देन की कहा करो बडाई ॥१॥

भक्त मांगत जोई देत तिहीं छिनु
सो ऐसी को करे प्रण निभाई ।
कुम्भनदास लाल गिरिधरन मुख निरखत,
कहो कैसे करि मन अघाई ॥२॥

२७) श्री यमुने पर तन मन धन प्राण वारो...

राग : सारंग

श्री यमुने पर तन मन धन प्राण वारो ।
जाकी कीर्ति विशद कौन अब कहि सकै,
ताहि नैनन तें न नेक टारों ॥१॥

चरण कमल इनके जु चिन्तत रहों,
निशदिनां नाम मुख तें उचारो ।
कुम्भनदास कहे लाल गिरिधरन मुख
इनकी कृपा भई तब निहारो ॥२॥

२८) भक्त इच्छा पूरन श्री यमुने जु करता....

राग : सारंग

भक्त इच्छा पूरन श्री यमुने जु करता ।
बिना मांगे हु देत, कहां लौ कहों हेत,
जैसे काहु को कोऊ होय धरता ॥१॥


श्री यमुना पुलिन रास, ब्रज बधू लिये पास,
मन्द मन्द हास कर मन जू हरता ।
कुम्भनदास लाल गिरिधरन मुख निरखत,

यही जिय लेखत श्री यमुने जु भरता ॥२॥

Friday, May 11, 2007

फूलन की मंडली मनोहर बैठे.....

राग : सारंग

फूलन की मंडली मनोहर बैठे, जहाँ रसिक पिय प्यारी ।
फूलन के बागे और भूषण, फूलन की पाग संवारी ॥१॥

ढिंग फूली वृषभान नंदिनी, तैसिये फूल रही उजियारी ।
फूलन के झूमका झरोखा बहु, फूलन की रची अटारी ॥२॥

फूले सखा चकोर निहारत, बीच चंद मिल किरण संवारी ।
चतुर्भुज दास मुदित सहचारी, फूले लाल गोवर्धन धारी ॥३॥

फूलन की मंडली मनोहर बैठे


राग : सारंग


फूलन की मंडली मनोहर बैठे, मदन मोहन पिय राजत ।
प्रसरित कुसुम सुवासित चहुँदिश, लुब्ध मधुप गुंजारत गाजत ॥१॥

पहरे विविध भांत आभूषण, पीतांबर वैजयंती छाजत ।
देखि मुखारविंद की शोभा, रतिपति आतुर भयो अति भ्राजत ॥२॥

एकरूप बहुरूप परस्पर, वरणों कहा देख मन लाजत ।
रसिकचरण सरोज आसरो करिवे, कोटि यत्न जिय साजत ॥३॥

बात कहत रसरंग उच्छलीता



राग: सारंग

बात
कहत रसरंग उच्छलीता ।
फूलन के महल बिराजत दोउ , मन्द सुगंध निकट वहे सरिता ॥१॥
मुख मिलाय हस देखत दर्पणमें , सुंदर श्रमित उरमाल विगलिता ।
परमानन्द प्रभु प्रेम विवश भये , कही हममें सुंदर को है ललिता ॥२॥
बात कहत रसरंग उच्छलीता ।