राग : कल्याण
श्री यमुने की आस अब करत है दास ।
मन कर्म बचन, कर जोरिके मांगत,
निशदिन रखिये अपने जु पास ॥१॥
जहाँ पिय रसिकवर, रसिकनी राधिका,
दोउ जन संग मिलि, करत है रास।
दास परमानंद, पाये अब ब्रजचंद,
देखी सिराने नैन मंदाहास ॥२॥
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Saturday, May 12, 2007
३८) श्री यमुने के साथ अब....
राग : कल्याण
श्री यमुने के साथ अब फ़िरत है नाथ ।
भक्त के मन के, मनोरथ पूरन करत ,
कहां लो कहिये इनकी जु गाथ ॥१॥
विविध सिंगार, आभूषन पहरे,
अंग अंग शोभा वरनी न जात ।
दास परमानंद पाये अब ब्रजचन्द
राखे अपने शरण बहे जु जात ॥२॥
श्री यमुने के साथ अब फ़िरत है नाथ ।
भक्त के मन के, मनोरथ पूरन करत ,
कहां लो कहिये इनकी जु गाथ ॥१॥
विविध सिंगार, आभूषन पहरे,
अंग अंग शोभा वरनी न जात ।
दास परमानंद पाये अब ब्रजचन्द
राखे अपने शरण बहे जु जात ॥२॥
३९) श्री यमुने पिय को....
राग : कल्याण
श्री यमुने पिय को बस तुमजु कीने ।
प्रेम के फंदते, गहिजु राखे निकट ,
ऐसे निर्मोल नग मोल लीने ॥१॥
तुमजु पठावत, तहां अब धावत
तिहारे रसरंग में, रहत भीने ।
दास परमानंद, पाये अब ब्रजचंद,
परम उदार श्री यमुनेजु दान दीने ॥२॥
श्री यमुने पिय को बस तुमजु कीने ।
प्रेम के फंदते, गहिजु राखे निकट ,
ऐसे निर्मोल नग मोल लीने ॥१॥
तुमजु पठावत, तहां अब धावत
तिहारे रसरंग में, रहत भीने ।
दास परमानंद, पाये अब ब्रजचंद,
परम उदार श्री यमुनेजु दान दीने ॥२॥
४०) श्री यमुने सुखकारनी प्राण प्रतिके...
राग : कल्याण
श्री यमुने सुखकारनी प्राण प्रतिके ।
जिन्हे भूलि जात पिय, तिने सुधि करि देत,
कहाँलों कहिये इनके जु हित के ॥१॥
पिय संग गान करे, उमंगी जो रस भरे,
देत तारी कर लेत झटके ।
दास परमानंद, पाये अब ब्रजचंद
येहि जानत सब प्रेम गति के ॥२॥
श्री यमुने सुखकारनी प्राण प्रतिके ।
जिन्हे भूलि जात पिय, तिने सुधि करि देत,
कहाँलों कहिये इनके जु हित के ॥१॥
पिय संग गान करे, उमंगी जो रस भरे,
देत तारी कर लेत झटके ।
दास परमानंद, पाये अब ब्रजचंद
येहि जानत सब प्रेम गति के ॥२॥
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