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Wednesday, August 10, 2011

राग : मालकोंस

प्रात:  समय हरी नाम लीजिये, आनंद मंगल में दिन जाय
चक्रपाणी करुणामय केशव विघ्न विनाशन यादावराय .. १ .. 

कलिमल हरण तरण भवसागर भक्त चिंतामणि कामधेनु 
ऐसो समर्थ नाम हरी को वंदनिक पावन पद रेनू  .. २ ..

शिव विरंची इन्द्रादि देवता मुनिजन करत नाम की आस 
भक्त वत्सल हरिनाम कल्पतरु वरदायक पर्मनानंददास .. ३ .. 

Wednesday, June 6, 2007

९) धाय के जाय जो श्री यमुना तीरे....

राग : मालकोंस

धाय के जाय जो श्री यमुना तीरे ।
ताकी महिमा अब कहां लग वरनिये,
जाय परसत अंग प्रेम नीरे ॥१॥

निश दिना केलि करत मनमोहन,
पिया संग भक्तन की हे जु भीरे ।
छीतस्वामी गिरिधरन श्री विट्ठल,
इन बिना नेंक नहिं धरत धीरे ॥२॥

१०) जा मुख तें श्री यमुने यह नाम आवे....

राग : मालकोंस

जा मुख तें श्री यमुने यह नाम आवे ।
तापर कृपा करत श्री वल्लभ प्रभु,
सोई श्री यमुना जी को भेद पावे ॥१॥

तन मन धन सब लाल गिरिधरन को देकें,
चरन जब चित्त लावे ।
छीतस्वामी गिरिधरन श्री विट्ठल,
नैनन प्रकट लीला दिखावे ॥२॥

११) धन्य श्री यमुने निधि देनहारी....

राग : मालकोंस

धन्य श्री यमुने निधि देनहारी ।
करत गुणगान अज्ञान अध दूरि करि,
जाय मिलवत पिय प्राणप्यारी ॥१॥

जिन कोउ सन्देह करो बात चित्त में धरो,
पुष्टिपथ अनुसरो सुखजु कारी ।
प्रेम के पुंज में रासरस कुंज में,
ताही राखत रसरंग भारी ॥२॥

श्री यमुने अरु प्राणपति प्राण अरु प्राणसुत,
चहुजन जीव पर दया विचारी ।
छीतस्वामी गिरिधरन श्री विट्ठल
प्रीत के लिये अब संग धारी ॥३॥

१२) गुण अपार मुख एक कहाँ लों कहिये.....

राग : मालकोंस

गुण अपार मुख एक कहाँ लों कहिये ।
तजो साधन भजो नाम श्री यमुना जी को
लाल गिरिधरन वर तबहि पैये ॥१॥

परम पुनीत प्रीति की रीति सब जानिके
दृढकरि चरण कमल जु गहिये ।
छीतस्वामी गिरिधरन श्री विट्ठल ,
ऐसी निधि छांडि अब कहाँ जु जैये ॥२॥