राग : देवगंधार
नैनभर देखो नंदकुमार।
जसुमती कुख चंद्रमा प्रगट्यों,
या व्रज को उजिंयार॥१॥
बन जिन जाऊ आज कोऊ,
गोसुत और गाय गुवार।
अपने अपने भेष सबे मिल,
लावो विविध सिंगार॥२॥
हरद दूब अक्षत दधी कुमकुम,
मंडित करो दुवार।
पुरो चौक विविध मुक्ताफल,
गाओ मंगलचार॥३॥
चहु वेदधूनी करत महामुनी,
होत नक्षत्र विचार।
उदयो पुन्यको पुंज सांवरो,
सकल सिद्दी दातार॥४॥
गोकुलवधु निरखि आनंदित,
सुन्दरताको सार।
दास चत्रभुज प्रभु सब सुखनिधि,
गिरिधर प्रण आधार॥५॥
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Friday, September 7, 2007
सब मिल आवो, गाओ बजाओ.....
राग : भैरव
सब मिल आवो, गाओ बजाओ।
कनकथाल भर भर मुक्ता फल,
न्योछावर ले कराओ॥१॥
नव नव पल्लव बंधनमाल,
द्वार द्वार बंधावन आनंदघन।
प्रभु जन्म सुनतहि,
लाग्यों सुजस सुहावन॥२॥
सब मिल आवो, गाओ बजाओ।
कनकथाल भर भर मुक्ता फल,
न्योछावर ले कराओ॥१॥
नव नव पल्लव बंधनमाल,
द्वार द्वार बंधावन आनंदघन।
प्रभु जन्म सुनतहि,
लाग्यों सुजस सुहावन॥२॥
Saturday, August 18, 2007
ग्वाल देत है हेरी घर घर....
राग : सारंग
घर घर ग्वाल देत है हेरी।
बाजत ताल मृदुंग बाँसुरी,
ढोल दमामा भेरी ॥१॥
लूटत झपट्त खात मिठाई,
कही ना सकत कोऊ फेरी।
उन्मद ग्वाल करत कोलाहल,
व्रज वनिता सब घेरी॥२॥
ध्वजा पताका तोरनमाला,
सबे सिंगारी सेरी।
जय जय कृष्ण कहत परमानंद,
प्रगट्यो कंसको वेरी॥३॥
घर घर ग्वाल देत है हेरी।
बाजत ताल मृदुंग बाँसुरी,
ढोल दमामा भेरी ॥१॥
लूटत झपट्त खात मिठाई,
कही ना सकत कोऊ फेरी।
उन्मद ग्वाल करत कोलाहल,
व्रज वनिता सब घेरी॥२॥
ध्वजा पताका तोरनमाला,
सबे सिंगारी सेरी।
जय जय कृष्ण कहत परमानंद,
प्रगट्यो कंसको वेरी॥३॥
Friday, August 17, 2007
नई बात सुन आई....
राग : मल्हार
हों तो एक नई बात सुन आई।
महरि जसोदा ढोटा जायो,
आंगन बजत बधाई ॥१॥
कहिये कहा कहत नहि आवे,
रतन भूमि छबि छाई ।
नाचत बिरध तरुण अरु बालक,
गोरस कीच मचाई ॥२॥
द्वारें भीतर गोप ग्वालन की,
वरनों कहा बढाई ।
सूरदास प्रभु अंतरयामी,
नंदसुवन सुखदाई ॥३॥
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