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Thursday, June 21, 2007

वर्षा की अगवानी.....

राग : मल्हार
वर्षा की अगवानी , आये माई वर्षा की अगवानी।
दादुर मोर पपैया बोले, कुंजन बग्पांत उडानी ॥१॥

घनकी गरज सुन, सुधी ना रही कछु,
बदरन देख डरानी ।

कुम्भनदास प्रभु गोवर्धनधर,
लाल
भये सुखदानी ॥२॥

Thursday, May 24, 2007

२५) श्री यमुने रस खान को शीश नांऊ....

राग : सारंग

श्री यमुने रस खान को शीश नांऊ।
ऐसी महिमा जानि भक्त को सुख दान,
जोइ मांगो सोइ जु पाऊं ॥१॥

पतित पावन करन नामलीने तरन,
दृढ कर गहि चरन कहूं न जाऊं ।
कुम्भनदास लाल गिरिधरन मुख निरखत,
यहि चाहत नहिं पलक लाऊं ॥२॥

२६) श्री यमुने अगनित गुन गिने न जाई...

राग : सारंग

श्री यमुने अगनित गुन गिने न जाई ।
श्री यमुने तट रेणु ते होत है नवीन तनु,
इनके सुख देन की कहा करो बडाई ॥१॥

भक्त मांगत जोई देत तिहीं छिनु
सो ऐसी को करे प्रण निभाई ।
कुम्भनदास लाल गिरिधरन मुख निरखत,
कहो कैसे करि मन अघाई ॥२॥

२७) श्री यमुने पर तन मन धन प्राण वारो...

राग : सारंग

श्री यमुने पर तन मन धन प्राण वारो ।
जाकी कीर्ति विशद कौन अब कहि सकै,
ताहि नैनन तें न नेक टारों ॥१॥

चरण कमल इनके जु चिन्तत रहों,
निशदिनां नाम मुख तें उचारो ।
कुम्भनदास कहे लाल गिरिधरन मुख
इनकी कृपा भई तब निहारो ॥२॥

२८) भक्त इच्छा पूरन श्री यमुने जु करता....

राग : सारंग

भक्त इच्छा पूरन श्री यमुने जु करता ।
बिना मांगे हु देत, कहां लौ कहों हेत,
जैसे काहु को कोऊ होय धरता ॥१॥


श्री यमुना पुलिन रास, ब्रज बधू लिये पास,
मन्द मन्द हास कर मन जू हरता ।
कुम्भनदास लाल गिरिधरन मुख निरखत,

यही जिय लेखत श्री यमुने जु भरता ॥२॥