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Wednesday, June 6, 2007

५) श्याम संग श्याम, बह रही श्री यमुने....

राग : बिलावल

श्याम संग श्याम, बह रही श्री यमुने ।
सुरत श्रम बिंदु तें, सिंधु सी बहि चली,
मानो आतुर अलि रही न भवने ॥१॥

कोटि कामहि वारों, रूप नैनन निहारो,
लाल गिरिधरन संग करत रमने ।
हरखि गोविन्द प्रभु, निरखि इनकी ओर,
मानों नव दुलहनीं आइ गवने ॥२॥

६) श्री यमुना सी नाही कोउ और दाता....

राग : बिलावल

श्री यमुना सी नाही कोउ और दाता ।
जो इनकी शरण जात है दौरि के,
ताहि को तीहिं छिनु कर सनाथा ॥१॥

एहि गुन गान रसखान रसना एक ,
सहस्त्र रसना क्यों न दइ विधाता ।
गोविन्द प्रभु तन मन धन वारने,
सबहि को जीवन इनही के जु हाथा ॥२॥

७) श्री यमुना जस जगत में जोइ गावे...

राग : बिलावल

श्री यमुना जस जगत में जोइ गावे ।
ताके अधीन ह्वै रहत हे प्राणपति
नैन अरु बेन में रस जु छावे ॥१॥

वेद पुराण की बात यह अगम हे,
प्रेम को भेद कोऊ न पावे ।
कहत गोविन्द श्री यमुने की जापर कृपा,
सोइ श्री वल्लभ कुल शरण आवे

८) चरण पंकज रेणु श्री यमुने जु देनी.....

राग : बिलावल


चरण पंकज रेणु श्री यमुने जु देनी ।
कलयुग जीव उद्धारण कारण,
काटत पाप अब धार पेनी ॥१॥


प्राणपति प्राणसुत आये भक्तन हित,
सकल सुख की तुम हो जु श्रेनी ।
गोविन्द प्रभु बिना रहत नहिं एक छिनु,
अतिहि आतुर चंचल जु नैनी ॥२॥