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Saturday, January 12, 2008

जागत रैंन गई, पिया बिन.....

राग : ललित

जागत रैंन गई, पिया बिन
जागत रैंन गई।
अवधि वदी गए, अजहू न आये,
बड़ी बेर भयीं॥१॥

कछु कहत हो, करत कछु और,
कौन सीख दई।
सांच नही तेरो एको अंग,
कहाँजू रीत लई॥२॥

कैसे कीजे विश्वास, भये हो विषई।
रसिक प्रीतम रावरी, छीन छीन गती नई॥३॥

Sunday, August 26, 2007

सेन कामकी लायो.....


राग : इमन

सेन कामकी लायो, सो सावन आयो।
चल सखी जुलिये, सुरंग हिंडोरे,
कीजे श्याममन भायो॥१॥

हावभाव के खंभ मनोहर,
कच घन गगन सुहायो।
कामनृपति वृषभाननंदिनी,
रसिकराय वर पायो॥२॥

लालन तो हो झूलो जो तुम.....

राग : ईमन

लालन तो हो झूलो जो तुम,
हौले हौले झूलावो।
डरपत हो घनश्याम मनोहर,
अपने कंठ लगायो॥१॥

हो उतरो तुम, झूलो मेरे मोहन,
जैसे जैसे गाँउ, तैसे तैसे गाओ।
रसिकप्रीतम पिय यह बिनती,
तनकी तपत बुजाओ॥२॥

Saturday, August 11, 2007

हरियारो सावन आयो...

राग : मल्हार

हरियारो सावन आयो,
देखो माई, हरियारो सावन आयो।
हर्यो टिपारो शीश बिराजत,
काछ हरी मन भायो॥१॥

हरी मुरली है, हरी संग राधे,
हरी भूमि सुखदाई।
हरी हरी वन राजत द्रुमवेली,
न्रुत्यत कुंवर कन्हाई॥२॥

हरी हरी सारी सखीजन पहरे,
चोली हरिरंग भीनी।
रसिक प्रीतम मन हरित भयो है,
सर्वस्व न्योछावर कीनी॥३॥

Wednesday, June 6, 2007

१) पिय संग रंग भरि करि किलोलें....

राग : रामकली

पिय संग रंग भरि करि किलोलें ।
सबन कों सुख देन पिय संग करत सेन,
चित्त में परत चेन जब हीं बोलें ॥१॥

अति हि विख्यात सब बात इनके हाथ,
नाम लेत कृपा करें अतोलें ।
दरस करि परस करि ध्यान हिय में धरें,
सदा ब्रजनाथ इन संग डोलें ॥२॥

अतिहि सुख करन दुख सबके हरन,
एही लीनो परन दे झकोले ।
ऐसी यमुने जान तुम करो गुनगान,
रसिक प्रियतम पाये नग अमोले ॥३॥

२) श्याम सुखधाम जहाँ नाम इनके

राग : रामकली

श्याम सुखधाम जहाँ नाम इनके ।
निशदिना प्राणपति आय हिय में बसे,
जोई गावे सुजश भाग्य तिनके ॥१॥

येही जग में सार कहत बारंबार,
सबन के आधार धन निर्धन के ।
लेत श्री यमुने नाम देत अभय पद दान,
रसिक प्रीतम प्रिया बसजु इनके ॥२॥

३) कहत श्रुतिसार निर्धार करिकें....

राग : रामकली

कहत श्रुतिसार निर्धार करिकें ।
इन बिना कौन ऐसी करे हे सखी,
हरत दुख द्वन्द सुखकंद बरखें ॥१॥

ब्रह्मसंबंध जब होत या जीव को,
तबहि इनकी भुजा वाम फरकें ।
दौरिकरि सौरकर जाय पियसों कहे,
अतिहि आनंद मन में जु हरखें ॥२॥

नाम निर्मोल नगले कोउ ना सके,
भक्त राखत हिये हार करिकें ।
रसिक प्रीतम जु की होत जा पर कृपा,
सोइ श्री यमुना जी को रूप परखें ॥३॥

४) नैन भरि देखि अब भानु तनया....

राग : रामकली

नैन भरि देखि अब भानु तनया ।
केलि पिय सों करें भ्रमर तबहि परें,
श्रम जल भरत आनंद मनया ॥१॥

चलत टेढी होय लेत पिय को मोहि,
इन बिना रहत नहिं एक छिनया ।
रसिक प्रीतम रास करत श्री यमुना पास,
मानो निर्धनन की है जु धनया ॥२॥