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Wednesday, August 10, 2011

राग : मालकोंस

प्रात:  समय हरी नाम लीजिये, आनंद मंगल में दिन जाय
चक्रपाणी करुणामय केशव विघ्न विनाशन यादावराय .. १ .. 

कलिमल हरण तरण भवसागर भक्त चिंतामणि कामधेनु 
ऐसो समर्थ नाम हरी को वंदनिक पावन पद रेनू  .. २ ..

शिव विरंची इन्द्रादि देवता मुनिजन करत नाम की आस 
भक्त वत्सल हरिनाम कल्पतरु वरदायक पर्मनानंददास .. ३ .. 

Saturday, January 12, 2008

जागत रैंन गई, पिया बिन.....

राग : ललित

जागत रैंन गई, पिया बिन
जागत रैंन गई।
अवधि वदी गए, अजहू न आये,
बड़ी बेर भयीं॥१॥

कछु कहत हो, करत कछु और,
कौन सीख दई।
सांच नही तेरो एको अंग,
कहाँजू रीत लई॥२॥

कैसे कीजे विश्वास, भये हो विषई।
रसिक प्रीतम रावरी, छीन छीन गती नई॥३॥

Friday, January 11, 2008

तुमसो बोलवेकी नाही....

राग : ललित

बोलवेकी नाहीं, तुमसो बोलवेकी नाहीं।
घर घर गमन करत सुंदरपिय,
चित्त नाही एक ठाहीं॥१॥

कहा कहो शामल घन तुमसो,
समज देख मन माहीं।
सूरदास प्रभु प्यारीके वचन सुन,
ह्रदय मांझ मुस्कानी॥२॥

कब देखो मेरी और....

राग : ललित

कब देखो मेरी और, नागर नन्दकिशोर,
बीनती करत भयो भोर।
हम चितवत तुम चितवत नाही,
मेरे कर्म कठोर॥१॥

जनम जनम की दासी तिहारी, तापर इतनो जोर।
सूरदासप्रभु तुम्हारे रोम पर,
वारो कंचन खोर॥२॥

Friday, July 27, 2007

गोवर्धन पर मुरवा...

राग : मल्हार

गोवर्धन पर मुरवा,
बोले माई, गोवर्धन पर मुरवा,
तेसिये श्यामघन मुरिली बजाई,
तेसेही उठे झुक धुरवा ।१।

बड़ी बड़ी बूंदन बर्खन लाग्यो,
पवन चलत अति जुरवा,
सूरदासप्रभु तिहारे मिलन को,
निस जागत भयो भुरवा ॥२॥

Friday, May 11, 2007

प्रात: समय श्री वल्लभसुतको...

राग : भैरव

प्रात: समय श्री वल्लभसुतको, उठतही रसना लीजे नाम ।
आनंद्कारी प्रभु मंगलकारी , अशुभहरण जन पूरण काम ॥१॥

याहि लोक परलोकके बंधु , को कही सकत तिहारे गुणगान ।
नंददास प्रभु रसिक शिरोमणि, राज करो श्री गोकुल सुखधाम ॥२॥

खिलावन आवेंगी ब्रजनारी....

राग : बिभास

खिलावन आवेंगी ब्रजनारी ।
जागो लाल चिरैया बोली, कहि जसुमति महतारी ॥१॥

ओट्यो दूध पान करि मोहन, वेगि करो स्नान गुपाल ।
करि सिंगार नवल बानिक बन, फेंटन भरो गुलाल ॥२॥

बलदाऊ ले संग सखा सब, खेलो अपने द्वार ।
कुमकुम चोवा चंदन छिरको, घसि मृगमद घनसार ॥३॥

ले कनहेरि सुनो मनमोहन, गावत आवे गारी ।
व्रजपति तबहिं चोंकि उठि बैठे, कित मेरी पिचकारी ॥४॥

Thursday, May 10, 2007

मैया मोहे माखन मिसरी भावे


मैया मोहे माखन मिसरी भावे ।
मीठो
दधि, मिठाई, मधुधृत, अपने करसो क्यो ना खवावे ॥१॥
कनक कटोरी दे कर मेरे, गो दोहन क्यो ना सिखावे ।
ओट्यो दूध , धेनु धोरिको , भरके कटोरा क्यो ना खिवावे ॥२॥
अजहू ब्याह करत नही मेरो, तोहे नींद कैसे आवे ।
चत्रभुज़प्रभू गिरिधरकी बतियाँ , सुनके उछंग पयपान करावे ॥३॥
मैया मोहे मकहन मिसरी भावे ।